जलियांवाला बाग हत्याकांड की कहानी | Jallianwala Bagh Massacre History And Facts In Hindi

जलियांवाला बाग हत्याकांड की कहानी | Jallianwala Bagh Massacre History And Facts In Hindi

जलियांवाला हत्या कांड और बर्बर अंग्रेज
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Jallianwala Bagh Massacre History And Facts In Hindi

“किसी की आँख में गोली लगी थी तो किसी की अंतड़ियाँ बाहर आ गई थीं.”

13 अप्रैल 1919 को भारतीय इतिहास के पन्नों में काला अध्याय के रूप में लिखा जाए तब भी जलियांवाला बाग हत्याकांड में मारे गए मासूम भारतीयों के साथ नाइंसाफी होगी! जलियाँवाला बाग़, अमृतसर शहर, तारीख 13 अप्रैल, 1919, वक़्त साँझ ढ़लने से 6 मिनट पहले…

रॉलेक्ट एक्ट के खिलाफ हुआ था विरोध –
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साल 1919 में हमारे देश में कई तरह के कानून, ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किए गए थे और इन कानूनों का विरोध हमारे देश के हर हिस्से में किया जा रहा था. 6 फरवरी, साल 1919 में ब्रिटिश सरकार ने इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में एक ‘रॉलेक्ट’ नामक बिल को पेश किया था और इस बिल को इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने मार्च के महीने में पास कर दिया था. जिसके बाद ये बिल एक अधिनियम बन गया था.

इस अधिनियम के अनुसार भारत की ब्रिटिश सरकार किसी भी व्यक्ति को देशद्रोह के शक के आधार पर गिरफ्तार कर सकती थी और उस व्यक्ति को बिना किसी जूरी के सामने पेश किए जेल में डाल सकती थी. इसके अलावा पुलिस दो साल तक बिना किसी भी जांच के, किसी भी व्यक्ति को हिरासत में भी रख सकती थी. इस अधिनियम ने भारत में हो रही राजनीतिक गतिविधियों को दबाने के लिए, ब्रिटिश सरकार को एक ताकत दे दी थी.

इस अधिनियम की मदद से भारत की ब्रिटिश सरकार, भारतीय क्रांतिकारियों पर काबू पाना चाहती थी और हमारे देश की आजादी के लिए चल रहे आंदोलनों को पूरी तरह से खत्म करना चाहित थी. इस अधिनियम का महात्मा गांधी सहित कई नेताओं ने विरोध किया था. गांधी जी ने इसी अधिनियम के विरुद्ध सत्याग्रह आंदोलन पूरे देश में शुरू किया था.

‘सत्याग्रह’ आंदोलन की शुरुआत
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साल 1919 में शुरू किया गया सत्याग्रह आंदोलन काफी सफलता के साथ पूरे देश में ब्रिटिश हकुमत के खिलाफ चल रहा था और इस आंदोलन में हर भारतीय ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया था. भारत के अमृतसर शहर में भी 6 अप्रैल, 1919 में इस आंदोलन के तहत एक हड़ताल की गई थी और रॉलेक्ट एक्ट का विरोध किया गया था. लेकिन धीरे-धीरे इस अहिंसक आंदोलन ने हिंसक आंदोलन का रूप ले लिया था.

9 अप्रैल को सरकार ने पंजाब से ताल्लुक रखने वाले दो नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था. इन नेताओं के नाम डॉ सैफुद्दीन कच्छू और डॉ. सत्यपाल था. इन दोनों नेताओं को गिरफ्तार करने के बाद ब्रिटिश पुलिस ने इन्हें अमृतसर से धर्मशाला में स्थानांतरित कर दिया गया था. जहां पर इन्हें नजरबंद कर दिया गया था.

Jallianwala Bagh Massacre History And Facts In Hindi

अमृतसर के ये दोनों नेता यहां की जनता के बीच काफी लोकप्रिय थे और अपने नेता की गिरफ्तारी से परेशान होकर, यहां के लोग 10 अप्रैल को इनकी रिहाई करवाने के मकसद से डिप्टी कमेटीर, मिल्स इरविंग से मुलाकात करना चाहते थे. लेकिन डिप्टी कमेटीर ने इन लोगों से मिलने से इंकार कर दिया था. जिसके बाद इन गुस्साए लोगों ने रेलवे स्टेशन, तार विभाग सहित कई सरकारी दफ्तरों को आग के हवाले कर दिया. तार विभाग में आग लगाने से सरकारी कामकाज को काफी नुकसान पहुंचा था, क्योंकि इसी के माध्यम से उस वक्त अफसरों के बीच संचार हो पाता था. इस हिंसा के कारण तीन अंग्रेजों की हत्या भी हो गई थी. इन हत्याओं से सरकार काफी खफा थी.

डायर को सौंपी गई अमृतसर की जिम्मेदारी
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अमृतसर के बिगड़ते हालातों पर काबू पाने के लिए भारतीय ब्रिटिश सरकार ने इस राज्य की जिम्मेदारी डिप्टी कमेटीर मिल्स इरविंग से लेकर ब्रिगेडियर जनरल आर.ई.एच डायर को सौंप दी थी और डायर ने 11 अप्रैल को अमृतसर के हालातों को सही करने का कार्य शुरू कर दिया. पंजाब राज्य के हालातों को देखते हुए इस राज्य के कई शहरों में ब्रिटिश सरकार ने मार्शल लॉ लगा दिया था. इस लॉ के तहत नागरिकों की स्वतंत्रता पर और सार्वजनिक समारोहों का आयोजन करने पर प्रतिबंध लग गया था.

मार्शल लॉ के तहत, जहां पर भी तीन से ज्यादा लोगों को इकट्ठा पाया जा रहा था, उन्हें पकड़कर जेल में डाला दिया जा रहा था. दरअसल इस लॉ के जरिए ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारियों द्वारा आयोजित होने वाली सभाओं पर रोक लगाना चाहती थी. ताकि क्रांतिकारी उनके खिलाफ कुछ ना कर सकें.

12 अप्रैल को सरकार ने अमृतसर के अन्य दो नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया था और इन नेताओं के नाम चौधरी बुगा मल और महाशा रतन चंद था. इन नेताओं की गिरफ्तारी के बाद अमृतसर के लोगों के बीच गुस्सा और बढ़ गया था. जिसके कारण इस शहर के हालात और बिगड़ने की संभावना थी. हालातों को संभालने के लिए इस शहर में ब्रिटिश पुलिस ने और सख्ती कर दी थी.

जलियांवाला बाग हत्याकांड
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13 अप्रैल को अमृतसर के जलियांवाला बाग में कई संख्या में लोगों इक्ट्ठा हुए थे. इस दिन इस शहर में कर्फ्यू लगाया गया था लेकिन इस दिन बैसाखी का त्योहार भी था. जिसके कारण काफी संख्या में लोग अमृतसर के हरिमन्दिर साहिब यानी स्वर्ण मंदिर आए थे. जलियांवाला बाग, स्वर्ण मंदिर के करीब ही था. इसलिए कई लोग इस बाग में घूमने के लिए भी चले गए थे और इस तरह से 13 अप्रैल को करीब 20,000 लोग इस बाग में मौजूद थे. जिसमें से कुछ लोग अपने नेताओं की गिरफ्तारी के मुद्दे पर शांतिपूर्ण रूप से सभा करने के लिए एकत्र हुए थे. वहीं कुछ लोग अपने परिवार के साथ यहां पर घूमने के लिए भी आए हुए थे.



 Jallianwala Bagh Massacre History And Facts In Hindi

इस दिन करीब 12:40 बजे, डायर को जलियांवाला बाग में होने वाली सभा की सूचना मिली थी. ये सूचना मिलने के बाद डायर करीब 4 बजे अपने दफ्तर से करीब 150 सिपाहियों के साथ इस बाग के लिए रवाना हो गए थे. डायर को लगा की ये सभा दंगे फैलाने के मकसद से की जा रही थी. इसलिए इन्होंने इस बाग में पहुंचने के बाद लोगों को बिना कोई चेतावनी दिए, अपने सिपाहियों को गोलियां चलाने के आदेश दे दिए

अचानक लोगों को ऊपर एक अजीब सी आवाज़ सुनाई दी.जलियाँवाला बाग़ में 15 से 25 हज़ार लोग जमा थे.
एक हवाई जहाज़ बाग़ के ऊपर नीची उड़ान भरते हुए जा रहा था. उसके एक पंख पर एक झंडा टंगा हुआ था. उन लोगों ने इससे पहले कोई हवाई जहाज़ नहीं देखा था.कुछ लोगों ने उसे देखते ही वहाँ से हट जाने में ही अपनी ख़ैर समझी.

अचानक लोगों को नेपथ्य से भारी बूटों की आवाज़ सुनाई दी और सेकेंडों में जलियाँवाला बाग़ के संकरीले रास्ते से 50 सैनिक प्रकट हुए और दो-दो का ‘फ़ॉर्मेशन’ बनाते हुए ऊंची जगह पर दोनों तरफ़ फैलने लगे.भीड़ का एक हिस्सा चिल्लाया, “आ गए, आ गए.” वो वहाँ से बाहर जाने के लिए उठे. तभी एक आवाज़ आई, “बैठ जाओ, बैठ जाओ. गोली नहीं चलेगी.”

बिना चेतावनी के फ़ायरिंग
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उसी क्षण ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर चिल्लाया, “गुरखाज़ राइट, 59 लेफ़्ट.”25 गोरखा और 25 बलूच सैनिकों में से आधों ने बैठ कर और आधों ने खड़े हो कर ‘पोज़ीशन’ ले ली. डायर ने बिना एक सेकेंड गंवाए आदेश दिया, ‘फ़ायर.’ सैनिकों ने निशाना लिया और बिना किसी चेतावनी के गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं. चारों तरफ़ लोग मर कर और घायल हो कर गिरने लगे. घुटने के बल बैठे हुए सैनिक चुन-चुन कर निशाना लगा रहे थे. उनकी कोई गोली बरबाद नहीं जा रही थी. डायर ने हुक्म दिया कि वो अपनी बंदूकें ‘रि-लोड’ करें और उस तरफ़ फ़ायरिंग करें जिधर सबसे ज़्यादा भीड़ है.
“चिल्लाते हुए दर्जनों लोगों ने एक बड़े पीपल के तने के पीछे आड़ ली. डायर ने अपने सैनिकों को हुक्म दिया कि वो पीपल के पेड़ को निशाना बनाएं.”

“उधर बहुत से लोग बाग के किनारों पर ऊँची दीवारों को लांघने की कोशिश कर रहे थे. डायर ने अपने सैनिकों की बंदूकों की नालें उनकी तरफ़ मुड़वा दीं.”

लेट गए लोगों को भी नहीं बख़्शा गया
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लोग डर कर हर दिशा में भागने लगे, लेकिन उन्हें बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं मिला.सारे लोग संकरी गलियों के प्रवेश द्वार पर जमा होकर बाहर निकलने की कोशिश करने लगे. डायर के सैनिकों ने इन्हीं को अपना निशाना बनाया. लाशें गिरने लगीं.कई लोगों ने दीवार चढ़ कर भागने की कोशिश की और सैनिकों की गोलियों का निशाना बने. भीड़ में मौजूद कुछ पूर्व सैनिकों ने चिल्ला कर लोगों से लेट जाने के लिए कहा.लेकिन ऐसा करने वालों को भी पहले से लेट कर पोज़ीशन लिए गोरखाओं ने नहीं बख़्शा. बाद में सार्जेंट एंडरसन ने जो जनरल डायर के बिल्कुल बगल में खड़े थे, हंटर कमेटी को बताया, “जब गोलीबारी शुरू हुई तो पहले तो लगा कि पूरी की पूरी भीड़ ज़मीन पर धराशाई हो गई है.””फिर हमने कुछ लोगों को ऊँची दीवारों पर चढ़ने की कोशिश करते देखा. थोड़ी देर में मैंने कैप्टेन ब्रिग्स के चेहरे की तरफ़ देखा. मुझे ऐसा लगा कि उन्हें काफ़ी दर्द महसूस हो रहा था.”

एक के ऊपर एक दस-बारह लाशें
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अपने छत से इस क़त्ले-आम को देख रहे मोहम्मद इस्माइल ने कांग्रेस की जाँच समिति को बताया, “मुझे पता था कि मेरे परिवार के कुछ लोग बाग़ में मौजूद हैं, लेकिन मैं उनकी मदद के लिए कुछ नहीं कर पाया.”

“बाद में मैं अपने चचेरे भाई को ढ़ूढ़ने निकला. मैंने कई लाशों को पलट कर उनके चेहरे देखे. मरने वालों में मेरे कई दोस्त और पड़ोसी थे. कई जगहों पर एक के ऊपर एक दस से बाहर लाशें पड़ी हुई थीं. मंडी के ख़ैरुद्दीन तेली के हाथ में उनका छह महीने का बच्चा था, जो मर चुका था.” फ़ायरिंग दस मिनटों तक जारी रही. लोगों के चीख़ने की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि डायर और उसके साथियों ने बाद में हंटर कमेटी को बताया कि उन्हें सैनिकों से फ़ायरिंग रुकवाने में बहुत मुश्किल आई क्योंकि उनकी आवाज़ उन तक पहुंच ही नहीं पा रही थी.

लाशों पर मंडराती चीलें
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सुबह तक बाग़ के ऊपर चीलें उड़ना शुरू हो गई थीं, ताकि वो नीचे पड़ी लाशों या घायल व्यक्तियों पर हमला कर उनका गोश्त खा सकें. गर्मी में लाशें सड़नी शुरू हो गई थीं. 35 साल के एक ठेकेदार लाला नाथू राम ने कांग्रेस की जाँच समिति को बताया, “मैं अपने बेटे और भाई को ढ़ूढ़ने निकला था. मुझे अपनी पगड़ी सिर पर रखने में बहुत मशक्कत करनी पड़ रही थी, क्योंकि गोश्त पाने की कोशिश में चीलें अपनी चोंचों से मेरे सिर पर झपट्टा मार रही थीं.” इस घटना के तीन महीनों बाद जब कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल वहाँ जाँच के लिए पहुंचा तो वहाँ वातावरण में अब भी लाशों के सड़ने की दुर्गंध मौजूद थी.

पूरे शहर का बिजली और पानी कटा
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इस बीच जलियाँवाला बाग़ में नरसंहार करने के बाद डायर शाम साढ़े छह बजे के आसपास अपने कैंप पहुंचा. उसने पूरे शहर की बिजली और पानी कटवा दिए. रात 10 बजे उसने शहर का एक बार फिर दौरा किया, ये देखने के लिए कि लोगों के घर से बाहर न निकलने के उसके आदेश का पालन हो रहा है या नहीं. इससे अधिक क्रूरता की और क्या बात हो सकती थी कि लोगों के बच्चे, रिश्तेदार और बुज़ुर्ग जलियाँवाला बाग़ में घायल तड़प या मर रहे रहे थे और लोगों को उनकी मदद करने के लिए बाहर आने की भी इजाज़त नहीं थी. डायर को उस रात सड़क पर एक शख़्स भी न दिखाई दिया हो, लेकिन पूरा शहर जाग रहा था लेकिन वहाँ एक मनहूस सन्नाटा छाया हुआ था.

हाउज़ ऑफ़ लॉर्ड्स ने दी डायर को क्लीन चिट
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शुरू में तो ब्रिटिश सरकार ने इतने बड़े हत्याकांड का कोई संज्ञान ही नहीं लिया. लेकिन जब ख़बरें फैलना शुरू हो गईं तो उन्होंने इसकी जाँच के लिए हंटर कमेटी का गठन किया.”हंटर कमेटी की रिपोर्ट में एक सर्वसम्मत रिपोर्ट थी और दूसरी अल्पमत की रिपोर्ट दी. दोनों पक्षों ने डायर को ग़लत माना लेकिन किस हद तक, इसमें दोनों पक्षों में मतभेद थे. लेकिन पंजाब के लेफ़्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ ड्वायर को उन्होंने कुछ नहीं कहा.”

“ब्रिटिश सरकार ने डायर को इस्तीफ़ा देने के लिए कहा. वहाँ के हाउज़ ऑफ़ कॉमंस में इस मुद्दे पर काफ़ी तीखी बहस हुई और वहाँ भी ये तय पाया गया कि जो डायर ने किया, वो पूरी तरह से ग़लत था. लेकिन हाउज़ ऑफ़ लॉर्ड्स ने इसको ‘ओवर- टर्न’ कर दिया. उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कहा कि आपने डायर के साथ नाइंसाफ़ी की है.”

“इस आदमी ने तो भारतीय साम्राज्य को बचाया था. तब तक डायर अपना पद छोड़ चुके थे. वहाँ के दक्षिणपंथी तत्वों ने डायर के लिए एक फ़ंड जमा करना शुरू किया और उनके लिए 26000 पाउंड जमा किए. बाद में जब 1927 में उनकी मृत्यु हुई तो उन्हें सैनिक सम्मान के साथ दफ़नाया गया.”

379 का आंकड़ा विवादास्पद
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हंटर कमेटी ने माना कि इस फ़ायरिंग में कुल 379 लोग मारे गए, जिनमें 337 पुरुष और 41 बच्चे थे. उस रात डायर ने जब पंजाब के लेफ़्टिनेंट गवर्नर ओ ड्वायर को अपनी रिपोर्ट भेजी तो उसमें कहा कि करीब 200 लोग मारे गए.”कई प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कम से कम हज़ार लोगों की मौत हुई और करीब 4-5 हज़ार घायल हुए. कुछ ऐसे भी थे जो बाग़ में न मर कर अपने घर जा कर मरे.”

 

“लोगों को पता नहीं चला कि इतने लोग मरे, क्योंकि वहाँ डर का माहौल था. अंग्रेज़ों की तरफ़ से कहा जा रहा था कि अगर आप जलियाँवाला बाग़ में मौजूद थे, तो आप ने सरकार के ख़िलाफ़ ग़द्दारी की है. इसलिए लोग बता ही नहीं रहे थे कि हमारे रिश्तेदार ज़ख्मी हैं या मरे हैं.”

इसके अलावा इस बाग में मौजूद कुएं से 100 से अधिक शव निकाले गए थे. ये शव ज्यादातर बच्चों और महिलाओं के ही थे. कहा जाता है कि लोग गोलियों से बचने के लिए कुएं में कूद गए थे, लेकिन फिर भी वो अपनी जान नहीं बचा पाए. वहीं कांग्रेस पार्टी के मुताबिक इस हादसे में करीब 1000 लोगों की हत्या हुई थी और 1500 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. लेकिन ब्रिटिश सरकार ने केवल 370 के करीब लोगों की मौत होने की पुष्टि की थी. ताकि उनके देश की छवि विश्व भर में खराब ना हो सके.

महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर का विरोध
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महात्मा गांधी ने इस घटना के विरोध में अपने सारे पदक वापस कर दिए. रवींद्रनाथ टैगोर ने वायसराय चेम्सफ़ोर्ड को पत्र लिख कर अपनी नाइटहुड की उपाधि वापस की. उसके बाद भारतीय लोगों और अंग्रेज़ों के बीच जो दूरी पैदा हुई, उसे कभी पाटा नहीं जा सका और 28 साल बाद अंग्रेज़ों को भारत से जाना पड़ा.

जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए बनाया गया कमेटी (Hunter Committee)
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जलियांवाला बाग को लेकर साल 1919 में एक कमेटी का गठन किया गया था और इस कमेटी का अध्यक्ष लार्ड विलियम हंटर को बनाया गया था. हंटर कमेटी नामक इस कमेटी की स्थापना जलियांवाला बाग सहित, देश में हुई कई अन्य घटनाओं की जांच करने के लिए की गई थी. इस कमेटी में विलियम हंटर के अलावा सात और लोग थे जिनमें कुछ भारतीय भी मौजूद थे. इस कमेटी ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के हर पहलू की जांच की और ये पता लगाने की कोशिश कि, की डायर ने जलियांवाला भाग में उस वक्त जो किया था, वो सही था कि गलत.

19 नवंबर साल 1919 में इस कमेटी ने डायर को अपने सामने पेश होने को कहा और उनसे इस हत्याकांड को लेकर सवाल किए. इस कमेटी के सामने अपना पक्ष रखते हुए डायर ने जो बयान दिया था उसके मुताबिक डायर को सुबह 12:40 पर जलियांवाला बाग में होने वाली एक बैठक के बारे में पता चला था, लेकिन उस समय उन्होंने इस बैठक को रोकने के लिए कोई भी कदम नहीं उठा. डायर के मुताबिक 4 बजे के आसपास वो अपने सिपाहियों के साथ बाग जाने के लिए रवाना हुए और उनके दिमाग में ये बात साफ थी, कि अगर वहां पर किसी भी तरह की बैठक हो रही होगी, तो वो वहां पर फायरिंग शुरू कर देंगे.

कमेटी के सामने डायर ने ये बात भी मानी थी, कि अगर वो चाहते तो लोगों पर गोली चलाए बिना उन्हें तितर-बितर कर सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. क्योंकि उनको लगा, कि अगर वो ऐसा करते तो कुछ समय बाद वापस वहां लोग इकट्ठा हो जाते और डायर पर हंसते. डायर ने कहा कि उन्हें पता था कि वो लोग विद्रोही हैं, इसलिए उन्होंने अपनी ड्यूटी निभाते हुए गोलियां चलवाईं. डायर ने अपनी सफाई में आगे कहा कि घायल हुए लोगों की मदद करना उनकी ड्यूटी नहीं थी. वहां पर अस्पताल खुले हुए थे और घायल वहां जाकर अपना इलाज करवा सकते थे.

8 मार्च 1920 को इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट को सार्वजनिक किया और हंटर कमेटी की रिपोर्ट में डायर के कदम को एकदम गलत बताया गया था. रिपोर्ट में कहा गया था कि लोगों पर काफी देर तक फायरिंग करना एकदम गलत था. डायर ने अपनी सीमों को पार करते हुए ये निर्णय लिया था. इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया था, कि पंजाब में ब्रिटिश शासन को खत्म करने की कोई में साजिश नहीं की जा रही थी. इस रिपोर्ट के आने के बाद 23 मार्च 1920 को डायर को दोषी पाते हुए उन्हें सेवानिवृत कर दिया गया था.

विंस्टन चर्चिल जो उस समय सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर वॉर थे, उन्होंने इस नरसंहार की आलोचना की थी और साल 1920 में हाउस ऑफ कॉमन्स में कहा था कि जिन लोगों की गोली मार कर हत्या की गई थी, उनके पास कोई भी हथियार नहीं थे, बस लाठियां थी. जब गोलियां चली तो ये लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे. ये लोग जब अपनी जान को बचाने के लिए कोनो पर जाकर छुपने लगे तो, वहां पर भी गोलियां चलाई गई. इसके अलावा जो लोग जमीन पर लेट गए उनको भी नहीं बक्शा गया और उनकी भी हत्या कर दी गई. चर्चिल के अलावा ब्रिटेन के पूर्व प्रधान मंत्री एच एच एच एस्क्विथ ने भी इस नरसंहार को गलत बताया था.

डायर की हत्या
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डायर सेवानिवृत होने के बाद लदंन में अपना जीवन बिताने लगे. लेकिन 13 मार्च 1940 का दिन उनकी जिंदगी का आखिरी दिन साबित हुआ. उनके द्वारा किए गए हत्याकांड का बदला लेते हुए उधम सिंह ने केक्सटन हॉल में उनको गोली मार दी. सिंह एक भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ता थे और कहा जाता है कि 13 अप्रैल के दिन वो भी उस बाग में मौजूद थे जहां पर डायर ने गोलियां चलवाईं थी और सिंह एक गोली से घायल भी हए थे. जलियांवाला बाग की घटना को सिंह ने अपनी आंखों से देखा था. इस घटना के बाद से सिंह डायर से बदला लेने की रणनीति बनाने में जुट गए थे और साल 1940 में सिंह अपनी रणनीति में कामयाब हुए और उन्होंने जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों की मौत का बदला ले लिया.

उधम सिंह के इस कदम की तारीफ कई विदेशी अखबारों ने की थी और हमारे देश के अखबार ‘अमृता बाजार पत्रिका’ ने कहा था कि हमारे देश के आम लोग और क्रांतिकारी, उधम सिंह की कार्रवाई से गौरवान्वित हैं. हालांकि इस हत्या के लिए उधम सिंह को लंदन में साल 1940 में फांसी की सजा दी गई थी. वहीं कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखते हुए सिंह ने कहा था, कि डायर को उन्होंने इसलिए मारा, क्योंकि वो इसी के लायक थे. वो हमारे देश के लोगों की भावना को कुचलना चाहते थे, इसलिए मैंने उनको कुचल दिया है. मैं 21 वर्षों से उनको मारने की कोशिश कर रहा था और आज मैंने अपना काम कर दिया है. मुझे मृत्यु का डर नहीं है, मैं अपने देश के लिए मर रहा हूँ.

उधम सिंह के इस बलिदान का हमारे देश के हर नागिरक ने सम्मान किया और जवाहर लाल नेहरू जी ने ,साल 1952 में सिंह को एक शहीद का दर्जा

अभी भी हैं गोलियों के निशान-
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जलियांवाला बाग आज के समय में एक पर्यटक स्थल बन गया है और हर रोज हजारों की संख्या में लोग इस स्थल पर आते हैं. इस स्थल पर अभी भी साल 1919 की घटना से जुड़ी कई यादें मौजूद हैं.
इस स्थल पर बनी एक दीवार पर आज भी उन गोलियों के निशान हैं जिनको डायर के आदेश पर उनके सैनिकों ने चलाया था. इसके अलावा इस स्थल पर वो कुआं भी मौजूद है जिसमें महिलाओं और बच्चों ने कूद कर अपनी जान दे दी थी.
आज भी इस हत्याकांड को दुनिया भर में हुए सबसे बुरे नरसंहार में गिना जाता है. इस साल यानी 2019में, इस हत्याकांड को हुए 100 हो गए हैं लेकिन अभी भी इस हत्याकांड का दुख उतना ही है जितना 100 साल पहले था. वहीं इस स्थल पर जाकर हर साल 13 अप्रैल के दिन उन लोगों की श्रद्धांजलि दी जाती है जिन्होंने अपनी जान इस हत्याकांड में गवाई थी.

ब्रिटिश सरकार ने नहीं मांगी माफी
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इस हत्याकांड को लेकर ब्रिटिश सरकार ने कई बार अपना दुख प्रकट किया है, लेकिन कभी भी इस हत्याकांड के लिए माफी नहीं मांगी है. साल 1997 में ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ-2 ने अपनी भारत की यात्रा के दौरान जलियांवाला बाग का भी दौरा किया था. जलियांवाला बाग में पहुंचकर उन्होंने अपने जूते उतारकर इस बाग में बनाई गई स्मारक के पास कुछ समय बिताया था और 30 मिनट तक के लिए मौन रखा था. भारत के कई नेताओं ने महारानी एलिजाबेथ-2 से माफी मांगने को भी कहा था. वहीं भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने रानी का बचाव करते हुए कहा कि रानी इस घटना के समय पैदा नहीं हुई थी और उन्हें माफी नहीं मांगनी चाहिए.

वहीं, साल 2016 में भारत के दौरे पर आए इंग्लैंड के प्रिंस विलियम और केट मिडलटन ने इस मुद्दा से दूरी बनाए रखने के लिए जलियांवाला बाग में ना जाने का फैसला लिया था. वहीं साल 2017 में इस स्मारक पर गए ब्रिटेन के मेयर महापौर सादिक खान ने एक बयान देते हुए कहा था कि ब्रिटिश सरकार को इस नरसंहार पर माफी मांगी चाहिए थी.

100 साल बाद जालियांवाला कांड पर ब्रिटेन ने जताया दु:ख, नहीें मांगी औपचारिक माफी
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ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार की घटना ब्रिटिश भारतीय इतिहास पर शर्मसार करने वाला धब्बा है। जैसा कि महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने 1997 में जलियांवाला बाग जाने से पहले कहा था कि यह भारत के साथ हमारे अतीत के इतिहास का दुखद उदाहरण है।

ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने अमृतसर के जलियांवाला नरसंहार कांड की 100वीं बरसी के मौके पर बुधवार (10 अप्रैल) को इस कांड को ब्रिटिश भारतीय इतिहास में ‘शर्मसार करने वाला धब्बा’ करार दिया लेकिन उन्होंने इस मामले में औपचारिक माफी नहीं मांगी। हाउस ऑफ कॉमन्स में प्रधानमंत्री के साप्ताहिक प्रश्नोत्तर की शुरूआत में उन्होंने अपने बयान में इस घटना पर ‘खेद’ जताया जो ब्रिटिश सरकार पहले ही जता चुकी है।

उन्होंने एक बयान में कहा, ‘‘1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार की घटना ब्रिटिश भारतीय इतिहास पर शर्मसार करने वाला धब्बा है। जैसा कि महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने 1997 में जलियांवाला बाग जाने से पहले कहा था कि यह भारत के साथ हमारे अतीत के इतिहास का दुखद उदाहरण है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘जो कुछ हुआ और लोगों को वेदना झेलनी पड़ी, उसके लिए हमें गहरा खेद है। मैं खुश हूं कि आज ब्रिटेन-भारत के संबंध साझेदारी, सहयोग, समृद्धि और सुरक्षा के हैं। भारतवंशी समुदाय ब्रिटिश समाज में बहुत योगदान दे रहा है और मुझे विश्वास है कि पूरा सदन चाहेगा कि ब्रिटेन के भारत के साथ संबंध बढ़ते रहें।’’ विपक्षी लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन ने मांग की कि नरसंहार में मारे गये लोग उस घटना के लिए पूरी तरह स्पष्ट माफी के हकदार हैं।

जलियांवाला बाग नरसंहार अमृतसर में 1919 में अप्रैल माह में बैसाखी के दिन हुआ था। इस दिन हजारों लोग रॉलेक एक्ट और आजादी की मांग करने वाले नेताओं सत्यपाल तथा डॉ. सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में जालियांबवाला बाग में इकट्ठा हुए थे। इस दौरान पंजाब के तत्कालीन गर्वनर माइकल ओड्वायर के आदेश पर अंग्रेज अधिकारी जनरल रेजीनल्ड डायर ने वहां मौजूद भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग करवायी। अचानक फायरिंग होने की वजह से चारो ओर भगदड़ मच गई।

बाग के चारो ओरा ऊंची दीवार होने की वजह से लोग कहीं भाग नहीं सके। कुछ लोगों ने जान बचाने के लिए वहां मौजूद कुंए में छलांग लगा दी। 100 से ज्यादा लोगों का शव कुंए से बरामद किया गया था। जनरल डायर ने तबतक गोलियां चलवायी, जब तक कि उनके बंदूक खाली नहीं हो गए। उस समय की रिपोर्ट के मुताबिक इस घटना में करीब 1000 लोग मारे गए थे और 2000 के आसपास घायल हुए थे। उन गोलियों के निशान वहां की दीवारों पर आज भी मौजूद है।